Reva: India’s First Electric Car That Everyone Forgot- Part 3: The Forgotten Road

The Road Reva Built

दो दशकों पहले अगर किसी ने कहा होता की इंडिया की सड़कों पर लाखों इलेक्ट्रिक व्हीकल्स चलेंगे, तो शायद बहुत कम लोग उस बात पर यकीन करते। उस वक्त इलेक्ट्रिक कार्स को एक प्रॅक्टिकल सोल्यूशन के बजाय एक एक्सपेरिमेंट माना जाता था। लिमिटेड रेंज, चार्जिंग इन्फ्रस्ट्रक्चर की कमी और हाइ प्राइसेस कि वजह से लोगों को लगता था की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का फ्यूचर इंडिया में मुश्किल है। लेकिन आज के टाइम पर तस्वीर अलग है।
टाटा नेक्सॉन EV से लेकर महिंद्रा XEV सीरीज, MG विंडसर EV और कई नए इलेक्ट्रिक स्कूटर्स तक, इंडियन मार्केट तेजी से बदल रहा है। गवर्नमेंट बैकिंग, बैटरी टेक्नॉलजी में इम्प्रूवमेंट्स और चार्जिंग नेटवर्क के एक्सपेंशन ने इलेक्ट्रिक विकल्स को मैनस्ट्रीम बना दिया गया है।
लेकिन इस प्रोग्रेस की कहानी में एक पचैप्टर ऐसा भी है जिसे अक्सर नजरंदाज कर दिया जाता है।
उस चैप्टर का नाम है रेवा।
यह सिर्फ इंडिया की पहली कॉमर्शियली कार नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसा प्रोजेक्ट था जिसने उस दौर में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को रियलिटी बनाने की कोशिश की थी, जब इस इंडस्ट्री के लिए ना मार्केट तयार था ना ही एकोसिस्टम। शायद इसी वजह से रेवा अपने समय से आगे थी।
पिछले दो पार्ट्स मे हमने देखा की कैसे बैंगलोर की एक स्टार्टअप ने इंडिया की पहली मॉडर्न इलेक्ट्रिक कार बनाई और कैसे टेक्नॉलजी के बावजूद मार्केट कन्डिशन, इन्फ्रस्ट्रक्चर और टाइमिंग ने उसके सफर को मुश्किल बना दिया। कभी-कभी एक इनोवेशन अपनी जनरेशन मे सक्सेसफुल नहीं होती, लेकिन वो अगली जनरेशन के लिए फाउंडेशन जरूर बन जाती है। और रेवा की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी।
The Foundation That Rarely Gets the Credit- आज जब इंडिया के इलेक्ट्रिक वीइकल मार्केट की बात होती है, तो अक्सर डिस्कशन टाटा मोटर्स, महिंद्रा, MG या नए EV स्टार्टअप्स के आस-पास ही घूमता है। लेकिन इन सबसे पहले एक छोटी सी बंगलोरे-बेस्ड कंपनी ने वो सवाल पूछा था जो उस वक्त लगभग किसी ने पूछने की हिम्मत नहीं की थी- क्या इंडिया अपनी इलेक्ट्रिक कार बना सकता है?
2001 में रेवा ने इस सवाल का जवाब सिर्फ वर्ड्स में नहीं, बल्कि एक वर्किंग प्रोडक्ट के रूप में दिया। इस जर्नी के दौरान कंपनी ने बैटरी मैनेजमेंट, एनर्जी इफिशन्सी और रीमोट वीइकल मॉनिटरिंग जैसे एरियाज़ में वैल्यूबल इक्स्पीरीअन्स हासिल किया। आज ये टेक्नोलॉजीज़ मॉडर्न इलेक्ट्रिक वीइकल का नॉर्मल हिस्सा लगता है, लेकिन दो दशक पहले इन पर काम करना एक बोल्ड डीसीजन था। रेवा की लेगसी सिर्फ कार तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसकी सबसे बड़ी कंट्रीब्यूशन यह थी की उसने एक ऐसे फ्यूचर की पॉसिबिलिटीज़ दिखाई, जिसे बाद में पूरी इंडस्ट्री ने अपनाया।

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source: Wikimedia Commons

When Reva Became G-Wiz

एक इंटरेस्टिंग बात है जो रेवा की कहानी को और भी अलग बनाती है।
जब इंडियन मार्केट इलेक्ट्रिक कार्स को लेकर अन्शुर था, उसी दौरान यूनाइटेड किंगडम इसी कार को G-wiz नाम से लॉन्च किया गया। यह सिर्फ नाम का बदलाव नहीं था, बल्कि एक नए मार्केट के हिसाब से तैयार की गई स्ट्रैटिजी थी। ब्रिटिश मार्केट की जरूरतें इंडियन मार्केट से अलग थी। लंदन जैसे भीड़-भाड़ वाले शहरों मे लोगों को एक ऐसी कम्पैक्ट कार चाहिए थी जो रोजाना के छोटे सफर को आसान से कर सके। इसी वजह से G-wiz को एक प्रॅक्टिकल अर्बन मोबिलिटी सोल्यूशन के रूप में पोजीशन किया गया।
कई ऑटोमोटिव रिपोर्ट्स के मुताबिक 2000s के दौरान रेवा UK की सबसे पहचानी जाने वाली इलेक्ट्रिक सिटी कार्स मे से एक बन गई। यह उस समय की बात है जब इलेक्ट्रिक विकल्स अभी भी एक niche केटेगरी थी और ग्लोबल EV मार्केट अपने शुरुवाती दौर में था। रेवा परफेक्ट कार नहीं थी, रेंज और परफॉर्मेंस जैसे चैलेंजेस उसके साथ हमेशा रहे। फिर भी उसने एक बात साफ कर दी- इंडिया में डेवलप हुई एक इलेक्ट्रिक कार इंटरनेशनल मार्केट तक पहुँच सकती है और अपनी जगह बना सकती है।
The Man Who Refused to Leave the EV Dream- महिन्द्रा एक्विजिशन के बाद रेवा का सफर धीरे-धीरे खतम हो गया, लेकिन चेतन मैनी का इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को लेकर विज़न नहीं रुका। बाद मे उन्होंने सन मोबिलिटी की को-फाउंडिंग की, जिसका फोकस बैटरी स्वापिंग टेक्नॉलजी पर था। इस मोडेल का मकसद चार्जिंग के लंबे इंतज़ार को कम करना था, जहां डिस्चार्ज्ड बैटरी से रिप्लेस किया जा सकता है। लेकिन एक बात क्लियर है- रेवा को सिर्फ एक कंपनी के रूप में देखना उसकी कहानी को छोटा कर देना होगा। रेवा एक प्रोडक्ट थी, लेकिन उसके पीछे जो विज़न था, वो आज भी इंडियन EV इंडस्ट्री के कई नए इनोवेशंस में किसी ना किसी रूप में जिंदा है।

Why Reva Deserves to be Remembered

आज जब रेवा का नाम लिया जाता है, तो ज्यादातर लोग उसे सिर्फ इंडिया की पहली इलेक्ट्रिक कार के रूप मे याद करते है। लेकिन उसकी कहानी सिर्फ इतनी नहीं है, अपने छोटे से सफर रेवा ने कई ऐसे काम किए है जो उस समय के हिसाब से काफी आगे थे। सबसे दिलचस्प बात यह है की रेवा की एक कार आज भी लंदन के साइंस म्यूज़ीअम की कलेक्शन का हिस्सा है। यह इस बात का संकेत है की रेवा को सिर्फ एक कमर्शियल प्रोडक्ट नहीं, बल्कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के हिस्ट्री मे एक इम्पॉर्टन्ट चैप्टर के रूप मे देखा जाता है।
कंपनी ने बैटरी मैनेजमेंट, रीमोट Diagnostics और एनर्जी इफिशन्सी जैसे फील्ड मे कई पेटेंट्स और टेक्नोलॉजीज पर काम किया।
रेवा ने सिर्फ इंडिया मे ही नहीं, बल्कि यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों मे भी अपनी अवैलबिलिटी दर्ज कराई। सेल्स नंबर्स आज के EV स्टैंडर्ड्स के हिसाब से छोटे लग सकते है, लेकिन 2000s के शुरुवाती दौर में किसी इंडियन स्टार्टअप के लिए एक उपलब्धि थी। शायद इसी वजह से रेवा को सिर्फ एक बंद हो चुकी कंपनी के रूप में देखना ठीक नहीं होगा। उसने एक ऐसे दौर में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पर काम किया, जहा ज्यादातर लोग इससे भविष्य का सपना मानते थे।
Lessons Every Startup Can Learn from Reva- रेवा की कहानी सिर्फ ऑटो मोबाईल इंडस्ट्री कि कहानी नहीं थी। यह इनोवैशन, टाइमिंग और मार्केट की भी कहानी है।
सबसे पहला सबक ये था की सिर्फ अच्छी टेक्नॉलजी की गारंटी नहीं होती। कई बार मार्केट और इन्फ्रस्ट्रक्चर को भी उस टेक्नॉलजी के लिए तैयार होना पड़ता है। पहला सबक टाइमिंग का है। कुछ आइडियाज गलत नहीं होते, लेकिन कभी-कभी वो अपने समय से पहले आ जाते है। आज जो चीजें आम लगती है, वही 2001 में लोगों को बहुत अलग और मुश्किल लगती थी। तीसरा सबक लॉंग-टर्म विज़न का है। रेवा कमर्शियल रेस नहीं जीत सकी, लेकिन उसने इंडिया में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को लेकर एक चर्चा जरूर शुरू की। आज जब नए स्टार्टअप्स EV सेक्टर में काम कर रहे हैं, तो उनके पास सीखने के लिए पहले से कई एग्ज़ांपल्स मौजूद है।

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source: Wikimedia commons

Was Reva Really a Failure?

अगर सिर्फ सेल्स् नंबर्स देखे जाए तो शायद कई लोग रेवा को एक फ़ेलियर कहंगे। कंपनी, मार्केट में ज्यादा समय तक टिक नहीं पाई, और आज उसका नाम भी ज्यादातर लोग भूल चुके है। लेकिन किसी भी इनोवैशन को सिर्फ उसकी कमर्शियल सक्सेस से जज करना हमेशा सही नहीं होता। जब रेवा लॉन्च हुई थी, तब इंडिया मे ना चार्जिंग स्टेशन था, ना गवर्नमेंट इंसेंटिव्स और ना ही इलेक्ट्रिक विकल्स को लेकर आज जैसी अवेर्नेस। शायद इसी वजह से रेवा को उस समय वो मार्केट नहीं मिला जिसकी उसे जरूरत थी। आज जब इलेक्ट्रिक विकल्स धीरे-धीरे इंडियन रोड्स का हिस्सा बन रहे हैं, तो यह समझना मुश्किल नहीं है की रेवा का आइडीया गलत नहीं था। शायद वो बस अपने समय से कुछ साल आगे थी। हो सकता है की रेवा कमर्शियल रेस ना जीत पाई हो, लेकिन उसने एक ऐसे इंडस्ट्री की शुरुवात जरूर की जिसका असली असर सालों बाद दिखाई दिया।
The End of a Car, Not an Idea- रेवा की स्टोरी सिर्फ एक कंपनी की स्टोरी नहीं थी है। यह इनोवैशन, टाइमिंग और बदलते हुए मार्केट की स्टोरी थी। आज टाटा, महिंद्रा, MG और कई नए स्टार्टअप्स, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पर काम कर रहे है। चार्जिंग स्टेशंस बढ रहे है, बैटरी टेक्नॉलजी इम्प्रूव हो रही है और इलेक्ट्रिक विकल्स धीरे-धीरे आम होते जा रहे यही। लेकिन इस बदलाव की शुरुवात उन कंपनीज़ ने की थी जिन्होंने सबसे पहले इस रास्ते पर चलने की हिम्मत दिखाई।
रेवा उन्ही कंपनीज़ में से एक थी। हो सकता है की आज सड़कों पर रेवा नजर न आए, लेकिन इंडियन EV इंडस्ट्री मे उसका नाम हमेश रहेगा।
यह थी रेवा की कहानी- एक ऐसी कार जो अपने समय से आगे थी, और इसी वजह से धीरे-धीरे लोगों की यादों से दूर चली गई। रेवा की कहानी एक बात याद दिलाती है: कभी-कभी सबसे बड़े आइडियाज को समझने में दुनिया को थोड़ा ज्यादा वक्त लगता है।

Disclaimer

यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्त्रोतों, ऐतिहासिक रिपोर्ट्स और पुरानी जानकारी पर आधारित है। कुछ बिक्री के आंकड़े और समय-सीमा विभिन्न स्त्रोतों मे अलग-अलग हो सकती है। इस लेख का उद्देश रेवा ,इंडिया की पहली कार के इतिहास को जानना है।

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